रत्न कोई साधारण आभूषण नहीं हैं, अपितु वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा और नवग्रहों की विशेष रश्मियों (Cosmic Rays) को मानव शरीर में केंद्रित करने वाले आध्यात्मिक यंत्र हैं। गलत रत्न धारण करना जीवन में भारी विपत्तियां ला सकता है, जबकि सही रत्न रंक को भी राजा बना सकता है।
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1. रत्न चयन का मूल वैदिक सिद्धांत
अधिकांश लोग समाचार-पत्रों अथवा नाम के पहले अक्षर के अनुसार रत्न धारण कर लेते हैं, जो शास्त्रसम्मत नहीं है। वैदिक ज्योतिष के मुख्य नियम:
- लग्नेश का रत्न (Life Stone): लग्न शरीर और आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। लग्नेश का रत्न सदैव शुभ, स्वास्थ्यवर्धक और दीर्घायु प्रदायक होता है।
- पंचमेश का रत्न (Lucky Stone): पंचम भाव बुद्धि, विद्या और पूर्वजन्म के संचित पुण्यों का है। इसका रत्न ज्ञान और निर्णय क्षमता बढ़ाता है।
- भाग्येश का रत्न (Fortune Stone): नवम भाव भाग्य और ईश्वरीय कृपा का होता है। इसका रत्न भाग्य के अवरोधों को नष्ट करता है।
- मारक अथवा त्रिक भावों (6, 8, 12) के स्वामियों का रत्न कभी नहीं पहनना चाहिए। उदाहरण के लिए, मेष लग्न में शुक्र मारक होता है, अतः हीरा या ओपल पहनने से दांपत्य व स्वास्थ्य हानि हो सकती है।
2. 12 लग्नों के मुख्य अनुकूल रत्न
- मेष व वृश्चिक: रक्त मूंगा (Red Coral)
- वृषभ व तुला: स्फटिक (Sphatik) / ओपल / हीरा
- मिथुन व कन्या: पन्ना (Emerald) / 4-5 मुखी रुद्राक्ष
- कर्क: सच्चा मोती (Natural Pearl) / स्फटिक
- सिंह: माणिक्य (Ruby) / 1 मुखी रुद्राक्ष
- धनु व मीन: पीला पुखराज (Yellow Sapphire)
- मकर व कुंभ: नीलम (Blue Sapphire) / करुणांगली
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