वैदिक ज्योतिष में मांगलिक दोष (Mangal Dosha / Kuja Dosha) को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां और भय व्याप्त हैं। महर्षि पराशर रचित बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार, जब जन्म लग्न, चंद्र या शुक्र से 1, 4, 7, 8 अथवा 12वें भाव में अग्नि तत्व प्रधान मंगल ग्रह स्थित होता है, तब जातक की कुंडली में मांगलिक योग बनता है।
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1. कुंडली के विभिन्न भावों में मंगल का प्रभाव
- प्रथम भाव (तनु भाव): जातक अत्यंत ऊर्जावान, साहसी और थोड़ा क्रोधी स्वभाव का हो सकता है। यह भाव सीधे सातवें (वैवाहिक) भाव पर दृष्टि डालता है।
- चतुर्थ भाव (सुख भाव): पारिवारिक सुख में अशांति, गृह कलेश या माता के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव की संभावना रहती है।
- सप्तम भाव (विवाह भाव): जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेद, स्वभाव में उग्रता तथा विवाह में अनावश्यक विलंब।
- अष्टम भाव (आयु व मांगलिक्य भाव): दांपत्य जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव, स्वास्थ्य चिंताएं। इसे पूर्ण मांगलिक दोष माना जाता है।
- द्वादश भाव (व्यय भाव): अनियंत्रित खर्च, शयन सुख में बाधा तथा गुप्त चिंताएं।
2. मांगलिक दोष कब स्वतः निष्प्रभावी (Cancel) हो जाता है?
वैदिक शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक मांगलिक कुंडली अशुभ नहीं होती। निम्नलिखित परिस्थितियों में मांगलिक दोष स्वतः समाप्त माना जाता है:
- यदि मंगल अपनी स्वराशि (मेष या वृश्चिक) अथवा उच्च राशि (मकर) में स्थित हो।
- यदि देवगुरु बृहस्पति की शुभ दृष्टि मंगल पर पड़ रही हो।
- यदि वर और कन्या दोनों की कुंडली मांगलिक हो, तो दोष का स्वतः परिहार हो जाता है।
- 28 वर्ष की आयु पूर्ण होने के पश्चात मंगल की उग्रता स्वतः संतुलित हो जाती है।
3. मांगलिक दोष शांति के अचूक वैदिक उपाय
यदि आपकी कुंडली में पूर्ण या आंशिक मांगलिक दोष है, तो भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। हमारे संस्थान द्वारा अनुशंसित प्रमुख वैदिक उपाय:
- प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं सुंदरकांड का पाठ करें।
- मंगलवार के दिन शिवलिंग पर लाल चंदन, मसूर की दाल और तांबे के लोटे से गंगाजल अर्पित करें।
- गाय को गुड़ और गेहूं की रोटी खिलाएं।
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